12 नवम्बर :"भारतीय लोक प्रसारण दिवस"


12 नवम्बर भारतीय प्रसारण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण तिथि है, इसे "भारतीय लोक प्रसारण दिवस" के रूप में मनाया जाता है । इस तिथि की महत्ता इसलिए है कि महात्मा गाँधी पहली और एक मात्र बार वर्ष 1947 में आकाशवाणी दिल्ली के स्टुडिओज़ में पधारे थे । उन्होंने तब भारत पाक विभाजन के विस्थापितों को रेडियो प्रसारण के माध्यम से सम्बोधित किया था जो कि हरियाणा के कुरुक्षेत्र में रिफ्यूजी शिविरों में रह रहे थे । 

आइये, आज हम बात करें भारत में रेडियो प्रसारण की । 

परन्तु भारत में सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के आधार की चर्चा करने से पहले विश्व पटल पर रेडियो प्रसारण के आरम्भ को जान लें । 

रेडियो यानी बेतार की सम्प्रेषण विधि, विज्ञान के बहुपयोगी चमत्कारों में से एक है ।  13 मई 1897 को एक इतालवी वैज्ञानिक गुग्लिएल्मो मार्कोनी (Guglielmo Giovanni Maria Marconi) द्वारा इस सम्प्रेषण विधि का सफल प्रयोग किया था ।  मार्कोनी का यह चमत्कारी प्रसारण लगभग 6 किलोमीटर दूर रिसीव किया गया यानी सुना गया था ! आप जानते हैं मार्कोनी के इस प्रथम प्रायोगिक प्रसारण का कथ्य क्या था, "आर यू रेडी ?" (Are  you ready ? - क्या तुम तैयार हो ?) जी हाँ, मात्र यही तीन शब्द !

मार्कोनी का ये प्रयोग आधारित था ध्वनि तरंगों की तकनीक पर जिसके अन्वेषक थे एक जर्मन भौतिकशास्त्री हेनरिक हर्ट्ज़ (Heinrich Rudolf Hertz) ।  इसीलिए आज भी सभी ध्वनि तरंगों के एकक अर्थात यूनिट और रेडियो फ्रीक्वेंसी का पता इसी वैज्ञानिक के नाम पर ही मिलता है । 

मार्कोनी की रेडियो प्रसारण तकनीक का 1900 ई० से ही व्यावसायिक उपयोग होने लगा । वर्ष 1906 के दिसम्बर महीने में पहली बार उच्चरित शब्द और संगीत का एक घंटे का रेडियो कार्यक्रम अमरीका के बोस्टन शहर के पास से प्रसारित किया गया था । इस कार्यक्रम के प्रस्तुतकर्ता थे एक कनाडियाई नागरिक रेनाल्ड फेसिनदेन (Reginald Fessenden) । ये प्रसारण तकनीकी पर्यवेक्षकों और चुनिन्दा सम्भावित शौक़िया श्रोताओं के लिए एक प्रयोग था । 

भारत में पहले ग़ैर पेशेवर यानी शौक़िया रेडियो क्लब का लाइसेंस 1921 में जारी किया गया था । यूं तो भारत में रेडियो प्रसारण वर्ष 1922 में ही आरम्भ हो गया था परन्तु वो केवल प्रायोगिक तौर पर ही किया जा रहा था जिस में कुछ शौक़िया रेडियो क्लब संलग्न थे ! 

इस बीच ही इंग्लैंड में रेडियो प्रसारण के व्यावसायिक होने पर वहां की सरकार ने रेडियो सुनने के लिए भी लाइसेंस लेना क़ानूनन ज़रूरी कर दिया और लाइसेंस लेने का आरंभिक शुल्क 22 शिलिंग रखा गया ।  इंग्लैंड की मुद्रा पाउंड में सौ शिलिंग होते हैं । उन दिनों रेडियो की शुरुआती क़ीमत लगभग 75 डॉलर थी ! ये राशि तब के एक आम भारतीय की कुल वार्षिक आय से भी ज़्यादा है, यानी रेडियो का शौक़ तब सस्ता नहीं था । 

नियमित तौर पर हमारे देश में रेडियो प्रसारण वर्ष 1923 में आरम्भ हुआ, और इस का श्रेय मिला "बॉम्बे प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब" को ।  बम्बई (आज का मुम्बई) के बाद इसी वर्ष यानि नवम्बर 1923 में ही कलकत्ता (आज का कोलकाता) से भी "कलकत्ता रेडियो क्लब" द्वारा प्रसारण आरभ हुआ । अगले वर्ष यानि 31 जुलाई 1924 में मद्रास (आज का चेन्नई) से भी "मद्रास प्रेसीडेंसी रेडियो क्लब" द्वारा प्रसारण शुरू हुआ । 

इसके बाद वर्ष 1927 में आधिकारिक रूप से एक कंपनी बनाई गई "इंडियन ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी लिमिटेड", जिसने 23 जुलाई 1927 को अपना प्रसारण आरम्भ किया । इसका उदघाटन तत्कालीन वाइसरॉय लॉर्ड इरविन द्वारा किया गया ।  यहां ध्यान देने की बात ये है कि ये एक प्राइवेट कम्पनी थी और तत्कालीन सरकार का इस में कोई दख़ल नहीं था, परन्तु अँगरेज़ सरकार से अनुमति ज़रूर ली गयी थी । "इण्डियन ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी लिमिटेड" ने 26 अगस्त 1927 को कलकत्ता से भी अपना प्रसारण आरम्भ किया । 

चूंकि "इण्डियन ब्रॉडकास्टिंग कम्पनी लिमिटेड" मार्च 1930 में दीवालिया हो गई अतः सरकार का हस्तक्षेप या सहारा इस कम्पनी को  मिला और प्रायोगिक रूप में दो साल के लिए 01 अप्रैल 1930 से अंग्रेजी सरकार के उद्योग और श्रम विभाग के अंतर्गत अधिगृहीत कर लिया गया और नाम दिया गया "इण्डियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस" (Indian State Broadcasting Service)। बाद में मई 1932 से इस अधिग्रहण को स्थाई कर दिया गया ।

वर्ष 1935 में "Controller of Broadcast" का पद सृजित किया गया और लिओनेल फील्डेन (Lionel Fielden) को भारत का पहला प्रसारण नियंत्रक बनाया गया ।

संभवतः इसी समय हिन्दोस्तान में भी रेडियो श्रोताओं के लिए लाइसेंस प्रणाली लागू की गई । लाइसेंस की राशि डाकघर में जमा की जाती थी जिसकी रसीद के तौर पर लाइसेंस बुक में सील ठप्पे के साथ दर्ज किया जाता था ।  इस लाइसेंस बुक को घर पर आये जांच इंस्पेक्टर के मांगे जाने पर दिखाना भी पड़ता था । आज की पीढ़ी को ये बातें शायद हास्यास्पद लगें क्योंकि उनके जन्म से पहले ही 1970 के दशक के शुरुआती वर्षों में ये श्रोता लाइसेंस व्यवस्था भारत सरकार द्वारा समाप्त कर दी गई थी । 

10 सितम्बर 1935 को मैसूर में एक निजी रेडियो केन्द्र ने प्रसारण आरम्भ किया जिसका नाम रखा गया "आकाशवाणी" ! इस केन्द्र की स्थापना श्री एम् वी गोपालस्वामी ने अपने निवास पर ही की थी और अनुप्रतीकात्मक नाम दिया था "आकाशवाणी" । श्री गोपालस्वामी मैसूर विश्वविद्यालय के महाराजा कॉलेज के प्राचार्य और मनोविज्ञान के सुविज्ञ प्राध्यापक थे । प्रसारण विज्ञान में उनकी रुचि ने उन्हें भारतीय प्रसारण का पुरोधा बनाया ।  आगे चलकर 01 जनवरी 1942 को महाराज मैसूर ने इस रेडियो केन्द्र को अपने संरक्षण और अधिग्रहण में ले लिया । 

1930 के दशक के मध्य तक देश में शौक़िया रेडियो प्रसारण संचालकों की संख्या 20 तक पहुँच गई थी । अगले दशक में ऐसे ही अनेक अवैध रेडियो प्रसारण भी होने लगे थे जो कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में लुका-छिपी करते जनजागरूकता का काम अंजाम दे रहे थे ! 

स्वाधीनता अभियान की जनजागरूकता में आगे रही एक 22 वर्षीय नवयुवती उषा मेहता ! 08 मार्च, 1942 को महात्मा गाँधी ने "अंग्रेज़ो, भारत छोड़ो" का नारा दिया था जिसे इस नवयुवती ने दिल में बैठा लिया । आंदोलन कि आंच को तेज़ करने के लिए उषा ने रेडियो प्रसारण करने कि ठानी ।  जब अँगरेज़ सरकार के दबाव में सारे अख़बार वग़ैरह बंद हो गए थे तब उषा मेहता के बहुत कम अवधि के रेडियो प्रसारणों ने भी आंदोलन की आग में घी का काम किया था !

वर्तमान आकाशवाणी के सूत्र - "सूचना, शिक्षा और मनोरंजन" के एक महत्वपूर्ण अंश को प्रसारण में स्थान मिला 19 जनवरी 1936 को और रेडियो से भारत में पहले समाचार बुलेटिन का प्रसारण हुआ !

08 जून 1936 को अंग्रेज़ी सरकार के इस इदारे इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस (Indian State Broadcasting Service) को नया नाम मिला "ऑल इंडिया रेडियो" (All India Radio) ! इसके बाद नवम्बर 1937 में ऑल इंडिया रेडियो को सूचना विभाग (Department of Communication) में शामिल किया गया । 

24 अक्टूबर 1941 को  विभाग का बदलाव हुआ और ऑल इंडिया रेडियो सूचना एवं प्रसारण विभाग का हिस्सा बना दिया गया । 

ऑल इंडिया रेडियो के कला पक्ष और सांस्कृतिक स्वरूप को देखते हुए फरवरी 1946 में इसके विभाग को नाम दिया गया "सूचना एवं कलाएं विभाग" !  विभागों की इन अनिश्चितताओं पर विराम तब लगा जब 10 सितम्बर 1946 को अंततः विभाग को "सूचना एवं प्रसारण विभाग" का नाम मिला !

इस बीच अक्टूबर 1939 से प्रसारण में विस्तार करते हुए ऑल इंडिया रेडियो ने विदेश सेवा के तहत अफ़ग़ानिस्तान और वर्तमान पकिस्तान के उत्तरी इलाक़ों के श्रोताओं के लिए पश्तो में कार्यक्रम प्रसारित करना आरम्भ किया ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात ऑल इंडिया रेडियो का सबसे बड़ा क़दम रहा वर्ष 1957 की 03 अक्टूबर से अपनी मनोरंजन सेवा "विविध भारती" का आरंभ जो आज भी देश का सबसे ज़्यादा सुना जाने वाला चैनल बना हुआ है ।  विविध भारती के संस्थापक कर्ताधर्ता थे कला, साहित्य और संस्कृति मर्मज्ञ पंडित नरेन्द्र शर्मा । आपने ही इस सेवा के बहुरंगी स्वरुप की परिकल्पना करते हुए नाम दिया था "विविध भारती" !

ऑल इंडिया रेडियो का नाम "आकाशवाणी" कब हुआ इसके बारे में कोई स्पष्ट जानकारी तो उपलब्ध नहीं है पर माना जाता है कि वर्ष १९५६-५७ से ही यह नाम प्रयोग किया जाने लगा ।

द्वारा योगदान : अनिल मुन्शी, वरिष्ठ उद्घोषक, विविध भारती सेवा, आकाशवाणी भोपाल ।

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