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विद्वतजन यह मानते रहे हैं कि संगीत के सात स्वरों का अनोखा रहस्य है।ईश्वरीय देन होने के कारण उनमें चमत्कारिक क्षमता भी है।लखनऊ के वरिष्ठ संगीतकार श्री एच.वसंत ने ब्लाग लेखक से हुई एक मुलाकात में संगीत के सात सुरों की व्याख्या कुछ इस प्रकार से की है-
सा- षडज,षड+अज=छह स्वरों को जन्म देनेवाला अर्थात समाज को आगे बढ़ाना।
रे- रिषभ=रियाज़,मेहनत करने का संकेत ।
ग= गांधार, गान+आधार=ग़म पड़ना
म- मध्यम=मन का स्थिर होना
प- पंचम=परमेश्वर की ओर बढ़ना
ध- धैवत=ध्यान लगाना अर्थात एकाग्रचित्त होकर काम में लग जाना
नि- निषाद=आदि निगमा दिन का ज्ञान/समाधि
सा- जहां से आया वहां पहुंचना,मुक्ति !
इसी क्रम में यह कहना चाहूंगा कि शास्त्रीय संगीत का मानव मूल्यों और ईश्वरीय तरंगों को विकसित करने में भी विशिष्ट योगदान है।संगीत को महज़ मनोरंजन की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।
इधर संगीत को आधार बनाकर म्यूजिक थेरेपी के अनेक प्रयोग सामने आये हैं।संगीत सुनकर दुधारु पशुओं का दूध बढ़ जाने,पौधों के विकसित होने,मानसिक बेचैनी और अनिद्रा दूर करने में मदद मिलने जैसे अनेक उदाहरण सुने गये हैं।लेकिन अभी पिछले दिनों कोलकाता के एक अस्पताल में 21वर्ष की संगीता दास नामक महिला को कोमा से बाहर लाने में जब शास्त्रीय संगीत ने मदद की तो सारी दुनियां में आश्चर्य छा गया है।दैनिक "अमर उजाला" की रिपोर्ट है:
"....आपने बचपन से सुना होगा कि तानसेन का संगीत सुनकर अकबर के दरबार में रखे हुए दीये अपने आप जल उठते थे, बारिश होने लगती थी। इस तरह की कहानी हमारे लिए हमेशा से किसी सपने जैसी रही है। लेकिन इस बात से कोई मना नहीं कर सकता कि जीवन में संगीत का एक खास महत्व होता है। आप चाहे दुखी हों या खुश हों संगीत सुनना लगभग हर परिस्थिति में पसंद करते ही होंगे। मगर क्या आपने कभी सुना है कि संगीत सुनकर कोई शख्स कोमा से बाहर आ गया हो। शायद नहीं।कोलकाता के एक अस्पताल में एक चमत्कार हुआ है। यहां कई दिनों से कोमा में रही 21 साल की युवती संगीत थेरेपी के जरिए बाहर आ गई है। यह चमत्कार सेठ सुखलाल करनानी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज एंड अस्पताल (एसएसकेएम) में हुआ है। अस्पताल में भर्ती संगीता दास को डॉक्टर संदीप कुमार ने दिन में तीन बार हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध वायलिन वादक एन. राजम के राग दरबारी कानड़ा को सुनने की सलाह दी थी! संगीता के परिवार ने इस सलाह को माना और नतीजा देखकर वह काफी खुश हैं। वहीं जब यही बात पद्म पुरस्कार से सम्मानित एन. राजम को पता चली तो वह हैरान हो गईं। अपनी खुशी का इजहार करते हुए उन्होंने कहा, 'मैंने जिंदगी में काफी पैसा कमाया, कई अवॉर्ड जीते लेकिन कभी सोचा नहीं था कि मेरा वायलिन वादन किसी को एक नई जिंदगी दे सकता है। मैं अपनी भावनाएं शब्दों में बयान नहीं कर सकती हूं। मैं संगीता के पूरी तरह स्वस्थ होने पर उससे मिलूंगी और उन डॉक्टरों से भी जिन्होंने उसे यह सलाह दी थी।' संगीता को जिस डॉक्टर ने वायलिन सुनने की सलाह दी थी वह खुद भी एक वॉयलिन वादक हैं। संगीता के ठीक होने पर उन्होंने कहा, 'मुझे लगता है कि हमें फिलहाल उसके पूरी तरह से होश में आने का इंतजार करना चाहिए। अभी उसके स्वास्थ्य में सुधार हो रहा है।'"
प्रसार भारती परिवार संगीत विधा की इस चमत्कारिक क्षमता पर गौरवान्वित है।ज्ञातव्य है कि आकाशवाणी दूरदर्शन में शुरू से ही संगीत को प्राथमिकता दी जाती रही है।कुछ वर्ष पूर्व संगीत को समर्पित"रागम"नामक चैनल भी चौबीसों घंटे सुलभ कराया जा चुका है।आकाशवाणी के संग्रहालय में संगीत के महान कलाकारों की मूल्यवान रिकार्डिंग भी उपलब्ध है।

स्त्रोत:"अमर उजाला "दैनिक
ब्लॉग रिपोर्ट-प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी, लखनऊ।  darshgrandpa@gmail.com   

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